Dharma.OS
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भवान्भीष्मश्चकर्णश्चकृपश्चसमितिञ्जयः।अश्वत्थामाविकर्णश्चसौमदत्तिस्तथैवच।।1.8।।
bhavānbhīṣhmaśhcha karṇaśhcha kṛipaśhcha samitiñjayaḥ aśhvatthāmā vikarṇaśhcha saumadattis tathaiva cha
संस्कृत शब्दों को तोड़कर सरल उच्चारण सीखें, धीमी गति में सुनें और अपना उच्चारण परखें
।।1.8।। आप (द्रोणाचार्य) और पितामह भीष्म तथा कर्ण और संग्रामविजयी कृपाचार्य तथा वैसे ही अश्वत्थामा, विकर्ण और सोमदत्त का पुत्र भूरिश्रवा।
"Thou thyself, Bhishma, Karna, Kripa, the victorious in war, Asvatthama, Vikarna, and Bhurisrava, the son of Somadatta—all these are ready for battle."
सम्पूर्ण दर्शनों का एकीकृत निचोड़
१. प्रसंग एवं ऐतिहासिक पृष्ठभूमि (अर्जुनविषादयोग - अध्याय 1, श्लोक 8): यह श्लोक कुरुक्षेत्र के युगांतकारी धर्मयुद्ध में सञ्जय द्वारा उच्चारित किया गया है। कुरुक्षेत्र के युगांतकारी धर्मयुद्ध में अर्जुन के विषाद, कुल-नाश के भय और आंतरिक संकोच का निरूपण। २. तत्त्व मीमांसा एवं दार्शनिक विश्लेषण: इस श्लोक में चेतना (Pure Consciousness), कर्म (Action), और समत्व (Equanimity) का गहरा समन्वय है। जब तक मनुष्य का विवेक मोह और संकीर्ण आसक्ति से ढका रहता है, तब तक वह कर्तव्य-पथ से विचलित होकर पलायन की इच्छा करता है। ३. मनोवैज्ञानिक विश्लेषण एवं आंतरिक रूपांतरण: मानसिक तनाव और निर्णयहीनता (Paralysis by Analysis) से मुक्ति पाने के लिए अपने अहम् और पक्षपात को पहचानना अनिवार्य है। आधुनिक मनोविज्ञान के अनुसार मानव की ९०% चिंताएं भविष्य के अनिश्चित परिणामों के डर से उत्पन्न होती हैं। यह श्लोक मनुष्य को मानसिक बिखराव (Cognitive Overload) से निकालकर वर्तमान क्षण की अखण्ड एकाग्रता (Flow State) में स्थापित करता है। ४. सर्वसम्मत समन्वय: चाहे अद्वैत का ज्ञान-मार्ग हो, विशिष्टाद्वैत का शरणागति-मार्ग हो, या द्वैत का भक्ति-मार्ग — सभी आचार्य एक स्वर में स्वीकार करते हैं कि यह श्लोक साधक को अज्ञान के अन्धकार से निकालकर अमरत्व के प्रकाश की ओर ले जाने वाला दिव्य मन्त्र है।
अध्याय 1, श्लोक 8 का दैनिक जीवन सूत्र: अपने चित्त को समता में स्थापित करें और फल की चिंता छोड़कर वर्तमान कर्तव्य को १००% उत्कृष्टता से पूर्ण करें।