Dharma.OS
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तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजंतमः।नाशयाम्यात्मभावस्थोज्ञानदीपेनभास्वता।।10.11।।
teṣhām evānukampārtham aham ajñāna-jaṁ tamaḥ nāśhayāmyātma-bhāva-stho jñāna-dīpena bhāsvatā
संस्कृत शब्दों को तोड़कर सरल उच्चारण सीखें, धीमी गति में सुनें और अपना उच्चारण परखें
।।10.11।। उन भक्तोंपर कृपा करनेके लिये ही उनके स्वरूप (होनेपन) में रहनेवाला मैं उनके अज्ञानजन्य अन्धकारको देदीप्यमान ज्ञानरूप दीपकके द्वारा सर्वथा नष्ट कर देता हूँ।
Out of compassion for them alone, I, abiding in their mental activity as its object, dispel the darkness born of ignorance with the brilliant lamp of knowledge.
सम्पूर्ण दर्शनों का एकीकृत निचोड़
१. प्रसंग एवं ऐतिहासिक पृष्ठभूमि (विभूतियोग - अध्याय 10, श्लोक 11): यह श्लोक कुरुक्षेत्र के युगांतकारी धर्मयुद्ध में श्री कृष्ण द्वारा उच्चारित किया गया है। विभूतियोग के अन्तर्गत समस्त ब्रह्माण्ड में परमात्मा के अनन्त ऐश्वर्य और कलाओं का प्रकटीकरण। २. तत्त्व मीमांसा एवं दार्शनिक विश्लेषण: इस श्लोक में चेतना (Pure Consciousness), कर्म (Action), और समत्व (Equanimity) का गहरा समन्वय है। जहाँ भी कोई तेज, शक्ति, सौंदर्य या विशेषता दृष्टिगोचर होती है, उसे परमात्मा के तेज का अंश मात्र जानें। ३. मनोवैज्ञानिक विश्लेषण एवं आंतरिक रूपांतरण: प्रकृति और मनुष्य के गुणों में दिव्यता का दर्शन करने से अहम् नष्ट होता है और कृतज्ञता का जन्म होता है। आधुनिक मनोविज्ञान के अनुसार मानव की ९०% चिंताएं भविष्य के अनिश्चित परिणामों के डर से उत्पन्न होती हैं। यह श्लोक मनुष्य को मानसिक बिखराव (Cognitive Overload) से निकालकर वर्तमान क्षण की अखण्ड एकाग्रता (Flow State) में स्थापित करता है। ४. सर्वसम्मत समन्वय: चाहे अद्वैत का ज्ञान-मार्ग हो, विशिष्टाद्वैत का शरणागति-मार्ग हो, या द्वैत का भक्ति-मार्ग — सभी आचार्य एक स्वर में स्वीकार करते हैं कि यह श्लोक साधक को अज्ञान के अन्धकार से निकालकर अमरत्व के प्रकाश की ओर ले जाने वाला दिव्य मन्त्र है।
अध्याय 10, श्लोक 11 का दैनिक जीवन सूत्र: अपने चित्त को समता में स्थापित करें और फल की चिंता छोड़कर वर्तमान कर्तव्य को १००% उत्कृष्टता से पूर्ण करें।