Dharma.OS
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मत्कर्मकृन्मत्परमोमद्भक्तःसङ्गवर्जितः।निर्वैरःसर्वभूतेषुयःसमामेतिपाण्डव।।11.55।।
mat-karma-kṛin mat-paramo mad-bhaktaḥ saṅga-varjitaḥ nirvairaḥ sarva-bhūteṣhu yaḥ sa mām eti pāṇḍava
संस्कृत शब्दों को तोड़कर सरल उच्चारण सीखें, धीमी गति में सुनें और अपना उच्चारण परखें
।।11.55।। हे पाण्डव! जो पुरुष मेरे लिए ही कर्म करने वाला है, और मुझे ही परम लक्ष्य मानता है, जो मेरा भक्त है तथा संगरहित है, जो भूतमात्र के प्रति निर्वैर है, वह मुझे प्राप्त होता है।।
He who performs actions for Me, who regards Me as his supreme goal, who is devoted to Me, who is free from attachment, and who is free from hatred towards all beings—he attains Me, O son of Pandu!
सम्पूर्ण दर्शनों का एकीकृत निचोड़
१. प्रसंग एवं ऐतिहासिक पृष्ठभूमि (विश्वरूपदर्शनयोग - अध्याय 11, श्लोक 55): यह श्लोक कुरुक्षेत्र के युगांतकारी धर्मयुद्ध में श्री कृष्ण द्वारा उच्चारित किया गया है। विश्वरूपदर्शनयोग के अन्तर्गत काल-स्वरूप परमात्मा का विराट एवं भयप्रद रूप-दर्शन। २. तत्त्व मीमांसा एवं दार्शनिक विश्लेषण: इस श्लोक में चेतना (Pure Consciousness), कर्म (Action), और समत्व (Equanimity) का गहरा समन्वय है। परमात्मा ही सृष्टि, स्थिति और संहार के सर्वसमर्थ नियंता हैं। समस्त जीव काल के मुख में पहले से ही समाए हुए हैं। ३. मनोवैज्ञानिक विश्लेषण एवं आंतरिक रूपांतरण: विशाल ब्रह्माण्ड के सामने अपने क्षुद्र अहंकार की निरर्थकता को समझकर विनीत एवं समर्पित बनें। आधुनिक मनोविज्ञान के अनुसार मानव की ९०% चिंताएं भविष्य के अनिश्चित परिणामों के डर से उत्पन्न होती हैं। यह श्लोक मनुष्य को मानसिक बिखराव (Cognitive Overload) से निकालकर वर्तमान क्षण की अखण्ड एकाग्रता (Flow State) में स्थापित करता है। ४. सर्वसम्मत समन्वय: चाहे अद्वैत का ज्ञान-मार्ग हो, विशिष्टाद्वैत का शरणागति-मार्ग हो, या द्वैत का भक्ति-मार्ग — सभी आचार्य एक स्वर में स्वीकार करते हैं कि यह श्लोक साधक को अज्ञान के अन्धकार से निकालकर अमरत्व के प्रकाश की ओर ले जाने वाला दिव्य मन्त्र है।
अध्याय 11, श्लोक 55 का दैनिक जीवन सूत्र: अपने चित्त को समता में स्थापित करें और फल की चिंता छोड़कर वर्तमान कर्तव्य को १००% उत्कृष्टता से पूर्ण करें।