Dharma.OS
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अभ्यासेऽप्यसमर्थोऽसिमत्कर्मपरमोभव।मदर्थमपिकर्माणिकुर्वन्सिद्धिमवाप्स्यसि।।12.10।।
abhyāse ’py asamartho ’si mat-karma-paramo bhava mad-artham api karmāṇi kurvan siddhim avāpsyasi
संस्कृत शब्दों को तोड़कर सरल उच्चारण सीखें, धीमी गति में सुनें और अपना उच्चारण परखें
।।12.10।।अगर तू अभ्यास-(योग-) में भी असमर्थ है, तो मेरे लिये कर्म करनेके परायण हो जा। मेरे लिये कर्मोंको करता हुआ भी तू सिद्धिको प्राप्त हो जायगा।
If you are incapable of doing a steady practice, then have Me as your chief aim in performing actions. Even by performing actions for Me, you shall attain success.
सम्पूर्ण दर्शनों का एकीकृत निचोड़
१. प्रसंग एवं ऐतिहासिक पृष्ठभूमि (भक्तियोग - अध्याय 12, श्लोक 10): यह श्लोक कुरुक्षेत्र के युगांतकारी धर्मयुद्ध में श्री कृष्ण द्वारा उच्चारित किया गया है। भक्तियोग के अन्तर्गत सगुण-निर्गुण उपासना का समन्वय और प्रिय भक्त के दिव्य लक्षण। २. तत्त्व मीमांसा एवं दार्शनिक विश्लेषण: इस श्लोक में चेतना (Pure Consciousness), कर्म (Action), और समत्व (Equanimity) का गहरा समन्वय है। जो किसी से द्वेष नहीं करता, जो सबका मित्र और करुणामय है, सुख-दुख में सम है — वही भक्त भगवान को अतिशय प्रिय है। ३. मनोवैज्ञानिक विश्लेषण एवं आंतरिक रूपांतरण: संवेदना, क्षमाशीलता और भावनात्मक समरसता ही उच्च कोटि के व्यक्तित्व की सच्ची पहचान है। आधुनिक मनोविज्ञान के अनुसार मानव की ९०% चिंताएं भविष्य के अनिश्चित परिणामों के डर से उत्पन्न होती हैं। यह श्लोक मनुष्य को मानसिक बिखराव (Cognitive Overload) से निकालकर वर्तमान क्षण की अखण्ड एकाग्रता (Flow State) में स्थापित करता है। ४. सर्वसम्मत समन्वय: चाहे अद्वैत का ज्ञान-मार्ग हो, विशिष्टाद्वैत का शरणागति-मार्ग हो, या द्वैत का भक्ति-मार्ग — सभी आचार्य एक स्वर में स्वीकार करते हैं कि यह श्लोक साधक को अज्ञान के अन्धकार से निकालकर अमरत्व के प्रकाश की ओर ले जाने वाला दिव्य मन्त्र है।
अध्याय 12, श्लोक 10 का दैनिक जीवन सूत्र: अपने चित्त को समता में स्थापित करें और फल की चिंता छोड़कर वर्तमान कर्तव्य को १००% उत्कृष्टता से पूर्ण करें।