Dharma.OS
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इन्द्रियार्थेषुवैराग्यमनहङ्कारएवच।जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम्।।13.9।।
indriyārtheṣhu vairāgyam anahankāra eva cha janma-mṛityu-jarā-vyādhi-duḥkha-doṣhānudarśhanam
संस्कृत शब्दों को तोड़कर सरल उच्चारण सीखें, धीमी गति में सुनें और अपना उच्चारण परखें
।।13.9।।इन्द्रियोंके विषयोंमें वैराग्यका होना, अहंकारका भी न होना और जन्म, मृत्यु, वृद्धावस्था तथा व्याधियोंमें दुःखरूप दोषोंको बार-बार देखना।
Renouncing the delights of the senses, being without pride, having a right understanding of the painful problem of birth and death, and of age and sickness;
सम्पूर्ण दर्शनों का एकीकृत निचोड़
१. प्रसंग एवं ऐतिहासिक पृष्ठभूमि (क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग - अध्याय 13, श्लोक 9): यह श्लोक कुरुक्षेत्र के युगांतकारी धर्मयुद्ध में श्री कृष्ण द्वारा उच्चारित किया गया है। क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग के अन्तर्गत शरीर (क्षेत्र) और आत्मा (क्षेत्रज्ञ) का वैज्ञानिक विवेक। २. तत्त्व मीमांसा एवं दार्शनिक विश्लेषण: इस श्लोक में चेतना (Pure Consciousness), कर्म (Action), और समत्व (Equanimity) का गहरा समन्वय है। शरीर २४ तत्वों का संघात है और आत्मा उससे सर्वथा असंग एवं शुद्ध साक्षी चैतन्य है। ३. मनोवैज्ञानिक विश्लेषण एवं आंतरिक रूपांतरण: स्वयं को विकारों से अलग एक साक्षी के रूप में देखने से मानसिक आघात तुरंत समाप्त हो जाते हैं। आधुनिक मनोविज्ञान के अनुसार मानव की ९०% चिंताएं भविष्य के अनिश्चित परिणामों के डर से उत्पन्न होती हैं। यह श्लोक मनुष्य को मानसिक बिखराव (Cognitive Overload) से निकालकर वर्तमान क्षण की अखण्ड एकाग्रता (Flow State) में स्थापित करता है। ४. सर्वसम्मत समन्वय: चाहे अद्वैत का ज्ञान-मार्ग हो, विशिष्टाद्वैत का शरणागति-मार्ग हो, या द्वैत का भक्ति-मार्ग — सभी आचार्य एक स्वर में स्वीकार करते हैं कि यह श्लोक साधक को अज्ञान के अन्धकार से निकालकर अमरत्व के प्रकाश की ओर ले जाने वाला दिव्य मन्त्र है।
अध्याय 13, श्लोक 9 का दैनिक जीवन सूत्र: अपने चित्त को समता में स्थापित करें और फल की चिंता छोड़कर वर्तमान कर्तव्य को १००% उत्कृष्टता से पूर्ण करें।