Dharma.OS
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लोभःप्रवृत्तिरारम्भःकर्मणामशमःस्पृहा।रजस्येतानिजायन्तेविवृद्धेभरतर्षभ।।14.12।।
lobhaḥ pravṛittir ārambhaḥ karmaṇām aśhamaḥ spṛihā rajasy etāni jāyante vivṛiddhe bharatarṣhabha
संस्कृत शब्दों को तोड़कर सरल उच्चारण सीखें, धीमी गति में सुनें और अपना उच्चारण परखें
।।14.12।। हे भरत-श्रेष्ठ ! रजोगुण के प्रवृद्ध होने पर लोभ, प्रवृत्ति (सामान्य चेष्टा) कर्मों का आरम्भ, शम का अभाव तथा स्पृहा, ये सब उत्पन्न होते हैं।।
O best of the Bharata dynasty, when rajas becomes predominant, these come into being: avarice, restlessness, undertaking of actions, agitation, and craving.
सम्पूर्ण दर्शनों का एकीकृत निचोड़
१. प्रसंग एवं ऐतिहासिक पृष्ठभूमि (गुणत्रयविभागयोग - अध्याय 14, श्लोक 12): यह श्लोक कुरुक्षेत्र के युगांतकारी धर्मयुद्ध में श्री कृष्ण द्वारा उच्चारित किया गया है। गुणत्रयविभागयोग के अन्तर्गत सत्व, रज और तम तीनों गुणों का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण और गुणातीत अवस्था। २. तत्त्व मीमांसा एवं दार्शनिक विश्लेषण: इस श्लोक में चेतना (Pure Consciousness), कर्म (Action), और समत्व (Equanimity) का गहरा समन्वय है। प्रकृति के तीनों गुण जीव को देह में बांधते हैं। गुणातीत होकर ही मनुष्य अमृतत्व और मोक्ष का साक्षात्कार करता है। ३. मनोवैज्ञानिक विश्लेषण एवं आंतरिक रूपांतरण: अपने मूड स्विंग्स और आलस्य व अति-लोभ को पहचानकर सत्व गुण को बढ़ाना ही मानसिक स्वास्थ्य है। आधुनिक मनोविज्ञान के अनुसार मानव की ९०% चिंताएं भविष्य के अनिश्चित परिणामों के डर से उत्पन्न होती हैं। यह श्लोक मनुष्य को मानसिक बिखराव (Cognitive Overload) से निकालकर वर्तमान क्षण की अखण्ड एकाग्रता (Flow State) में स्थापित करता है। ४. सर्वसम्मत समन्वय: चाहे अद्वैत का ज्ञान-मार्ग हो, विशिष्टाद्वैत का शरणागति-मार्ग हो, या द्वैत का भक्ति-मार्ग — सभी आचार्य एक स्वर में स्वीकार करते हैं कि यह श्लोक साधक को अज्ञान के अन्धकार से निकालकर अमरत्व के प्रकाश की ओर ले जाने वाला दिव्य मन्त्र है।
अध्याय 14, श्लोक 12 का दैनिक जीवन सूत्र: अपने चित्त को समता में स्थापित करें और फल की चिंता छोड़कर वर्तमान कर्तव्य को १००% उत्कृष्टता से पूर्ण करें।