Dharma.OS
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उत्तमःपुरुषस्त्वन्यःपरमात्मेत्युदाहृतः।योलोकत्रयमाविश्यबिभर्त्यव्ययईश्वरः।।15.17।।
uttamaḥ puruṣhas tv anyaḥ paramātmety udāhṛitaḥ yo loka-trayam āviśhya bibharty avyaya īśhvaraḥ
संस्कृत शब्दों को तोड़कर सरल उच्चारण सीखें, धीमी गति में सुनें और अपना उच्चारण परखें
।।15.17।।उत्तम पुरुष तो अन्य ही है, जो परमात्मा नामसे कहा गया है। वही अविनाशी ईश्वर तीनों लोकोंमें प्रविष्ट होकर सबका भरण-पोषण करता है।
There is a Supreme Person other than these. He is referred to as the Supreme Self (Paramatma) in all the Vedas. He, as the Immutable One and the Lord, enters the threefold world and supports it.
सम्पूर्ण दर्शनों का एकीकृत निचोड़
१. प्रसंग एवं ऐतिहासिक पृष्ठभूमि (पुरुषोत्तमयोग - अध्याय 15, श्लोक 17): यह श्लोक कुरुक्षेत्र के युगांतकारी धर्मयुद्ध में श्री कृष्ण द्वारा उच्चारित किया गया है। पुरुषोत्तमयोग के अन्तर्गत ऊर्ध्वमूल अश्वत्थ वृक्ष का रूपक और क्षर-अक्षर से परे पुरुषोत्तम तत्व। २. तत्त्व मीमांसा एवं दार्शनिक विश्लेषण: इस श्लोक में चेतना (Pure Consciousness), कर्म (Action), और समत्व (Equanimity) का गहरा समन्वय है। संसार रूपी वृक्ष को असंगता (वैराग्य) के सुदृढ़ शस्त्र से काटकर उस परम पद को खोजना चाहिए जहाँ से पुनरावृत्ति नहीं होती। ३. मनोवैज्ञानिक विश्लेषण एवं आंतरिक रूपांतरण: संसार की व्यर्थ उलझनों से मानसिक डिटेचमेंट विकसित करना ही सच्ची स्वतंत्रता है। आधुनिक मनोविज्ञान के अनुसार मानव की ९०% चिंताएं भविष्य के अनिश्चित परिणामों के डर से उत्पन्न होती हैं। यह श्लोक मनुष्य को मानसिक बिखराव (Cognitive Overload) से निकालकर वर्तमान क्षण की अखण्ड एकाग्रता (Flow State) में स्थापित करता है। ४. सर्वसम्मत समन्वय: चाहे अद्वैत का ज्ञान-मार्ग हो, विशिष्टाद्वैत का शरणागति-मार्ग हो, या द्वैत का भक्ति-मार्ग — सभी आचार्य एक स्वर में स्वीकार करते हैं कि यह श्लोक साधक को अज्ञान के अन्धकार से निकालकर अमरत्व के प्रकाश की ओर ले जाने वाला दिव्य मन्त्र है।
अध्याय 15, श्लोक 17 का दैनिक जीवन सूत्र: अपने चित्त को समता में स्थापित करें और फल की चिंता छोड़कर वर्तमान कर्तव्य को १००% उत्कृष्टता से पूर्ण करें।