Dharma.OS
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प्रवृत्तिंचनिवृत्तिंचजनानविदुरासुराः।नशौचंनापिचाचारोनसत्यंतेषुविद्यते।।16.7।।
pravṛittiṁ cha nivṛittiṁ cha janā na vidur āsurāḥ na śhauchaṁ nāpi chāchāro na satyaṁ teṣhu vidyate
संस्कृत शब्दों को तोड़कर सरल उच्चारण सीखें, धीमी गति में सुनें और अपना उच्चारण परखें
।।16.7।।आसुरी प्रकृतिवाले मनुष्य प्रवृत्ति और निवृत्तिको नहीं जानते और उनमें न बाह्यशुद्धि, न श्रेष्ठ आचरण तथा न सत्य-पालन ही होता है।
Neither do the demoniacal persons understand what should be done and what should not be done; nor do they possess purity, good conduct, or truthfulness.
सम्पूर्ण दर्शनों का एकीकृत निचोड़
१. प्रसंग एवं ऐतिहासिक पृष्ठभूमि (दैवासुरसम्पद्विभागयोग - अध्याय 16, श्लोक 7): यह श्लोक कुरुक्षेत्र के युगांतकारी धर्मयुद्ध में श्री कृष्ण द्वारा उच्चारित किया गया है। दैवासुरसम्पद्विभागयोग के अन्तर्गत दैवी और आसुरी प्रवृत्तियों का सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक विभाजन। २. तत्त्व मीमांसा एवं दार्शनिक विश्लेषण: इस श्लोक में चेतना (Pure Consciousness), कर्म (Action), और समत्व (Equanimity) का गहरा समन्वय है। अभय, अहिंसा और सत्य दैवी सम्पदा हैं; दंभ, दर्प, क्रोध और अज्ञान आसुरी सम्पदा हैं जो विनाश की ओर ले जाती हैं। ३. मनोवैज्ञानिक विश्लेषण एवं आंतरिक रूपांतरण: काम, क्रोध और लोभ — ये तीनों आत्मा का नाश करने वाले नरक के तीन मुख्य द्वार हैं, इनका सर्वथा त्याग करें। आधुनिक मनोविज्ञान के अनुसार मानव की ९०% चिंताएं भविष्य के अनिश्चित परिणामों के डर से उत्पन्न होती हैं। यह श्लोक मनुष्य को मानसिक बिखराव (Cognitive Overload) से निकालकर वर्तमान क्षण की अखण्ड एकाग्रता (Flow State) में स्थापित करता है। ४. सर्वसम्मत समन्वय: चाहे अद्वैत का ज्ञान-मार्ग हो, विशिष्टाद्वैत का शरणागति-मार्ग हो, या द्वैत का भक्ति-मार्ग — सभी आचार्य एक स्वर में स्वीकार करते हैं कि यह श्लोक साधक को अज्ञान के अन्धकार से निकालकर अमरत्व के प्रकाश की ओर ले जाने वाला दिव्य मन्त्र है।
अध्याय 16, श्लोक 7 का दैनिक जीवन सूत्र: अपने चित्त को समता में स्थापित करें और फल की चिंता छोड़कर वर्तमान कर्तव्य को १००% उत्कृष्टता से पूर्ण करें।