Dharma.OS
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अदेशकालेयद्दानमपात्रेभ्यश्चदीयते।असत्कृतमवज्ञातंतत्तामसमुदाहृतम्।।17.22।।
adeśha-kāle yad dānam apātrebhyaśh cha dīyate asat-kṛitam avajñātaṁ tat tāmasam udāhṛitam
संस्कृत शब्दों को तोड़कर सरल उच्चारण सीखें, धीमी गति में सुनें और अपना उच्चारण परखें
।।17.22।। जो दान बिना सत्कार किये, अथवा तिरस्कारपूर्वक, अयोग्य देशकाल में, कुपात्रों के लिए दिया जाता है, वह दान तामस माना गया है।।
The gift which is given at an inappropriate place, time, and to unworthy persons, and which is converted into a bad act and is disrespected—that is declared to be of the Tamas.
सम्पूर्ण दर्शनों का एकीकृत निचोड़
१. प्रसंग एवं ऐतिहासिक पृष्ठभूमि (श्रद्धात्रयविभागयोग - अध्याय 17, श्लोक 22): यह श्लोक कुरुक्षेत्र के युगांतकारी धर्मयुद्ध में श्री कृष्ण द्वारा उच्चारित किया गया है। श्रद्धात्रयविभागयोग के अन्तर्गत आहार, यज्ञ, तप, दान की त्रिविध प्रकृति और ॐ तत्सत् का महामंत्र। २. तत्त्व मीमांसा एवं दार्शनिक विश्लेषण: इस श्लोक में चेतना (Pure Consciousness), कर्म (Action), और समत्व (Equanimity) का गहरा समन्वय है। मनुष्य की जैसी श्रद्धा होती है, वैसा ही उसका स्वरूप बन जाता है। सात्विक आहार और सात्विक तप ही कल्याणकारी हैं। ३. मनोवैज्ञानिक विश्लेषण एवं आंतरिक रूपांतरण: अपने खान-पान, दिनचर्या और वचनों में सात्विकता लाकर जीवन की गुणवत्ता को उच्चतम स्तर पर ले जाएं। आधुनिक मनोविज्ञान के अनुसार मानव की ९०% चिंताएं भविष्य के अनिश्चित परिणामों के डर से उत्पन्न होती हैं। यह श्लोक मनुष्य को मानसिक बिखराव (Cognitive Overload) से निकालकर वर्तमान क्षण की अखण्ड एकाग्रता (Flow State) में स्थापित करता है। ४. सर्वसम्मत समन्वय: चाहे अद्वैत का ज्ञान-मार्ग हो, विशिष्टाद्वैत का शरणागति-मार्ग हो, या द्वैत का भक्ति-मार्ग — सभी आचार्य एक स्वर में स्वीकार करते हैं कि यह श्लोक साधक को अज्ञान के अन्धकार से निकालकर अमरत्व के प्रकाश की ओर ले जाने वाला दिव्य मन्त्र है।
अध्याय 17, श्लोक 22 का दैनिक जीवन सूत्र: अपने चित्त को समता में स्थापित करें और फल की चिंता छोड़कर वर्तमान कर्तव्य को १००% उत्कृष्टता से पूर्ण करें।