Dharma.OS
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कट्वम्ललवणात्युष्णतीक्ष्णरूक्षविदाहिनः।आहाराराजसस्येष्टादुःखशोकामयप्रदाः।।17.9।।
kaṭv-amla-lavaṇāty-uṣhṇa- tīkṣhṇa-rūkṣha-vidāhinaḥ āhārā rājasasyeṣhṭā duḥkha-śhokāmaya-pradāḥ
संस्कृत शब्दों को तोड़कर सरल उच्चारण सीखें, धीमी गति में सुनें और अपना उच्चारण परखें
।।17.9।।अति कड़वे, अति खट्टे, अति नमकीन, अति गरम, अति तीखे, अति रूखे और अति दाहकारक आहार अर्थात् भोजनके पदार्थ राजस मनुष्यको प्रिय होते हैं, जो कि दुःख, शोक और रोगोंको देनेवाले हैं।
Those in whom passion is dominant like foods that are bitter, sour, salty, overly hot, pungent, dry, and burning. These produce unhappiness, repentance, and disease.
सम्पूर्ण दर्शनों का एकीकृत निचोड़
१. प्रसंग एवं ऐतिहासिक पृष्ठभूमि (श्रद्धात्रयविभागयोग - अध्याय 17, श्लोक 9): यह श्लोक कुरुक्षेत्र के युगांतकारी धर्मयुद्ध में श्री कृष्ण द्वारा उच्चारित किया गया है। श्रद्धात्रयविभागयोग के अन्तर्गत आहार, यज्ञ, तप, दान की त्रिविध प्रकृति और ॐ तत्सत् का महामंत्र। २. तत्त्व मीमांसा एवं दार्शनिक विश्लेषण: इस श्लोक में चेतना (Pure Consciousness), कर्म (Action), और समत्व (Equanimity) का गहरा समन्वय है। मनुष्य की जैसी श्रद्धा होती है, वैसा ही उसका स्वरूप बन जाता है। सात्विक आहार और सात्विक तप ही कल्याणकारी हैं। ३. मनोवैज्ञानिक विश्लेषण एवं आंतरिक रूपांतरण: अपने खान-पान, दिनचर्या और वचनों में सात्विकता लाकर जीवन की गुणवत्ता को उच्चतम स्तर पर ले जाएं। आधुनिक मनोविज्ञान के अनुसार मानव की ९०% चिंताएं भविष्य के अनिश्चित परिणामों के डर से उत्पन्न होती हैं। यह श्लोक मनुष्य को मानसिक बिखराव (Cognitive Overload) से निकालकर वर्तमान क्षण की अखण्ड एकाग्रता (Flow State) में स्थापित करता है। ४. सर्वसम्मत समन्वय: चाहे अद्वैत का ज्ञान-मार्ग हो, विशिष्टाद्वैत का शरणागति-मार्ग हो, या द्वैत का भक्ति-मार्ग — सभी आचार्य एक स्वर में स्वीकार करते हैं कि यह श्लोक साधक को अज्ञान के अन्धकार से निकालकर अमरत्व के प्रकाश की ओर ले जाने वाला दिव्य मन्त्र है।
अध्याय 17, श्लोक 9 का दैनिक जीवन सूत्र: अपने चित्त को समता में स्थापित करें और फल की चिंता छोड़कर वर्तमान कर्तव्य को १००% उत्कृष्टता से पूर्ण करें।