Dharma.OS
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सर्वधर्मान्परित्यज्यमामेकंशरणंव्रज।अहंत्वासर्वपापेभ्योमोक्षयिष्यामिमाशुचः।।18.66।।
sarva-dharmān parityajya mām ekaṁ śharaṇaṁ vraja ahaṁ tvāṁ sarva-pāpebhyo mokṣhayiṣhyāmi mā śhuchaḥ
संस्कृत शब्दों को तोड़कर सरल उच्चारण सीखें, धीमी गति में सुनें और अपना उच्चारण परखें
।।18.66।। सब धर्मों का परित्याग करके तुम एक मेरी ही शरण में आओ, मैं तुम्हें समस्त पापों से मुक्त कर दूँगा, तुम शोक मत करो।।
Give up your earthly duties, surrender yourself to Me alone. Do not be anxious; I will absolve you from all your sins.
सम्पूर्ण दर्शनों का एकीकृत निचोड़
१. **प्रसंग एवं गीता का चरम महावाक्य**: सम्पूर्ण १८ अध्यायों और ७०० श्लोकों के उपदेश का यह चरम शिखर है। यहाँ भगवान श्री कृष्ण अर्जुन के समस्त संशयों और बन्धनों का अन्त करते हुए परम शरणागति का मार्ग उद्घाटित करते हैं। २. **'सर्वधर्मान् परित्यज्य' का वास्तविक रहस्य**: यहाँ धर्म त्यागने का अर्थ अधर्म करना नहीं, अपितु 'अहंकारयुक्त कर्तापन' और नाना प्रकार के कर्मकाण्डों के मानसिक बोझ को त्यागना है। जब मनुष्य अपने अहम् को परब्रह्म में विसर्जित कर देता है, तब वह सम्पूर्ण पापों से मुक्त हो जाता है। ३. **आदि शंकराचार्य एवं रामानुजाचार्य चरम भाष्य**: शंकराचार्य के अनुसार सर्वधर्म परित्याग ही 'सर्वकर्मसंन्यास' और अद्वैत ज्ञान की पराकाष्ठा है। रामानुजाचार्य के अनुसार यह 'शरणागति' का महामन्त्र है, जहाँ भक्त ईश्वर की कृपा पर सम्पूर्ण निर्भर हो जाता है। ४. **मनोवैज्ञानिक विश्लेषण एवं 'मा शुचः'**: 'मा शुचः' — यह भगवान का परम अभय वचन है। जब साधक अपना सारा मानसिक भार और गिल्ट ईश्वर को समर्पित कर देता है, तब अन्तःकरण में असीम आनन्द और मुक्ति का उदय होता है।
अध्याय 18, श्लोक 66 का दैनिक जीवन सूत्र: अपने चित्त को समता में स्थापित करें और फल की चिंता छोड़कर वर्तमान कर्तव्य को १००% उत्कृष्टता से पूर्ण करें।