Dharma.OS
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इदंतेनातपस्कायनाभक्तायकदाचन।नचाशुश्रूषवेवाच्यंनचमांयोऽभ्यसूयति।।18.67।।
idaṁ te nātapaskyāya nābhaktāya kadāchana na chāśhuśhruṣhave vāchyaṁ na cha māṁ yo ‘bhyasūtayi
संस्कृत शब्दों को तोड़कर सरल उच्चारण सीखें, धीमी गति में सुनें और अपना उच्चारण परखें
।।18.67।। यह ज्ञान ऐसे पुरुष से नहीं कहना चाहिए, जो अतपस्क (तपरहित) है, और न उसे जो अभक्त है; उसे भी नहीं जो अशुश्रुषु (सेवा में अतत्पर) है और उस पुरुष से भी नहीं कहना चाहिए, जो मुझ (ईश्वर) से असूया करता है, अर्थात् मुझ में दोष देखता है।।
This knowledge is for you, and it should never be imparted to one who does not observe austerities; to one who has no devotion; to one who has no desire to listen; and to one who is indignant towards Me.
सम्पूर्ण दर्शनों का एकीकृत निचोड़
१. प्रसंग एवं ऐतिहासिक पृष्ठभूमि (मोक्षसंन्यासयोग - अध्याय 18, श्लोक 67): यह श्लोक कुरुक्षेत्र के युगांतकारी धर्मयुद्ध में श्री कृष्ण द्वारा उच्चारित किया गया है। मोक्षसंन्यासयोग के अन्तर्गत त्याग और सन्यास की पराकाष्ठा, अठारह पुराणों का सार और चरम शरणागति। २. तत्त्व मीमांसा एवं दार्शनिक विश्लेषण: इस श्लोक में चेतना (Pure Consciousness), कर्म (Action), और समत्व (Equanimity) का गहरा समन्वय है। समस्त सांसारिक संशयों को त्यागकर केवल परमात्मा की शरण में जाना ही सम्पूर्ण ज्ञान का परम निष्कर्ष है। ३. मनोवैज्ञानिक विश्लेषण एवं आंतरिक रूपांतरण: जहाँ विवेकयुक्त पुरुषार्थ (अर्जुन) और ईश्वरीय मार्गदर्शन (श्री कृष्ण) का मिलन होता है, वहाँ विजय सुनिश्चित है। आधुनिक मनोविज्ञान के अनुसार मानव की ९०% चिंताएं भविष्य के अनिश्चित परिणामों के डर से उत्पन्न होती हैं। यह श्लोक मनुष्य को मानसिक बिखराव (Cognitive Overload) से निकालकर वर्तमान क्षण की अखण्ड एकाग्रता (Flow State) में स्थापित करता है। ४. सर्वसम्मत समन्वय: चाहे अद्वैत का ज्ञान-मार्ग हो, विशिष्टाद्वैत का शरणागति-मार्ग हो, या द्वैत का भक्ति-मार्ग — सभी आचार्य एक स्वर में स्वीकार करते हैं कि यह श्लोक साधक को अज्ञान के अन्धकार से निकालकर अमरत्व के प्रकाश की ओर ले जाने वाला दिव्य मन्त्र है।
अध्याय 18, श्लोक 67 का दैनिक जीवन सूत्र: अपने चित्त को समता में स्थापित करें और फल की चिंता छोड़कर वर्तमान कर्तव्य को १००% उत्कृष्टता से पूर्ण करें।