Dharma.OS
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नजायतेम्रियतेवाकदाचिन्नायंभूत्वाभवितावानभूयः।अजोनित्यःशाश्वतोऽयंपुराणोनहन्यतेहन्यमानेशरीरे।।2.20।।
na jāyate mriyate vā kadāchin nāyaṁ bhūtvā bhavitā vā na bhūyaḥ ajo nityaḥ śhāśhvato ’yaṁ purāṇo na hanyate hanyamāne śharīre
संस्कृत शब्दों को तोड़कर सरल उच्चारण सीखें, धीमी गति में सुनें और अपना उच्चारण परखें
।।2.20।। यह शरीरी न कभी जन्मता है और न मरता है तथा यह उत्पन्न होकर फिर होनेवाला नहीं है। यह जन्मरहित, नित्य-निरन्तर रहनेवाला, शाश्वत और पुराण (अनादि) है। शरीरके मारे जानेपर भी यह नहीं मारा जाता।
Never is this One born, nor does It ever die; nor, having come into existence, does It cease to be. This One is birthless, eternal, undecaying, and ancient; It is not killed when the body is killed.
सम्पूर्ण दर्शनों का एकीकृत निचोड़
१. **प्रसंग एवं पृष्ठभूमि (अध्याय २ - सांख्ययोग)**: अर्जुन के मन में यह घोर संशय था कि युद्ध में भीष्म और द्रोण जैसे पूजनीय सम्बन्धियों को मारकर वह पाप का भागी बनेगा। इस भ्रम का समूल उच्छेदन करने के लिए भगवान श्री कृष्ण यहाँ सांख्य दर्शन का सर्वोच्च सत्य — 'आत्म-अविनाशिता' — उद्घाटित करते हैं। २. **षड्भावविकार से मुक्ति (षड्-अवस्था रहित आत्मा)**: प्रकृति में प्रत्येक पदार्थ ६ अवस्थाओं (जन्म, अस्तित्व, वृद्धि, परिवर्तन, क्षय और विनाश) से गुजरता है। किन्तु आत्मा विशुद्ध चैतन्य स्वरूप है, जो काल और देश से परे है। आत्मा का कभी जन्म नहीं हुआ, अतः उसकी कभी मृत्यु सम्भव नहीं। ३. **आदि शंकराचार्य भाष्य (अद्वैत वेदान्त)**: शंकराचार्य स्पष्ट करते हैं कि जैसे घट के फूटने पर महाकाश नष्ट नहीं होता, वैसे ही देह के नष्ट होने पर देही अखण्ड रहता है। मृत्यु केवल वस्त्र बदलने जैसी बाह्य घटना है। ४. **मनोवैज्ञानिक विश्लेषण एवं निर्भयता**: मानव मन का सबसे गहरा भय 'मृत्यु का भय' है। जब साधक यह समझ लेता है कि उसका मूल स्वभाव शरीर नहीं अपितु अमर आत्मा है, तब समस्त संकोच, अवसाद, और कायरता सदा के लिए विलीन हो जाती है।
अध्याय 2, श्लोक 20 का दैनिक जीवन सूत्र: अपने चित्त को समता में स्थापित करें और फल की चिंता छोड़कर वर्तमान कर्तव्य को १००% उत्कृष्टता से पूर्ण करें।