Dharma.OS
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यामिमांपुष्पितांवाचंप्रवदन्त्यविपश्चितः।वेदवादरताःपार्थनान्यदस्तीतिवादिनः।।2.42।।
yāmimāṁ puṣhpitāṁ vāchaṁ pravadanty-avipaśhchitaḥ veda-vāda-ratāḥ pārtha nānyad astīti vādinaḥ kāmātmānaḥ swarga-parā janma-karma-phala-pradām kriyā-viśheṣha-bahulāṁ bhogaiśhwarya-gatiṁ prati
संस्कृत शब्दों को तोड़कर सरल उच्चारण सीखें, धीमी गति में सुनें और अपना उच्चारण परखें
।।2.42 -- 2.43।। हे पृथानन्दन ! जो कामनाओंमें तन्मय हो रहे हैं, स्वर्गको ही श्रेष्ठ माननेवाले हैं, वेदोंमें कहे हुए सकाम कर्मोंमें प्रीति रखनेवाले हैं, भोगोंके सिवाय और कुछ है ही नहीं - ऐसा कहनेवाले हैं, वे अविवेकी मनुष्य इस प्रकारकी जिस पुष्पित (दिखाऊ शोभायुक्त) वाणीको कहा करते हैं, जो कि जन्मरूपी कर्मफलको देनेवाली है तथा भोग और ऐश्वर्यकी प्राप्तिके लिये बहुतसी क्रियाओंका वर्णन करनेवाली है।
- O Partha, the unwise, who rejoice in the letter of the Vedas, say, "There is nothing else." They are full only of worldly desires and they hanker for heaven. They speak flowery words that offer mirth as the fruit of work. They look upon the Vedas as consisting entirely of varied rites for the attainment of pleasure and power. Those who cling so to pleasure and power are attracted by that speech (offering heavenly rewards) and are unable to develop the resolute will of a concentrated mind.
सम्पूर्ण दर्शनों का एकीकृत निचोड़
१. प्रसंग एवं ऐतिहासिक पृष्ठभूमि (सांख्ययोग - अध्याय 2, श्लोक 42): यह श्लोक कुरुक्षेत्र के युगांतकारी धर्मयुद्ध में श्री कृष्ण द्वारा उच्चारित किया गया है। सांख्ययोग के अन्तर्गत आत्मा की अमरता, षड्भावविकार से परे अविनाशी चैतन्य और स्थितप्रज्ञ के दिव्य लक्षण। २. तत्त्व मीमांसा एवं दार्शनिक विश्लेषण: इस श्लोक में चेतना (Pure Consciousness), कर्म (Action), और समत्व (Equanimity) का गहरा समन्वय है। देह परिवर्तनशील वस्त्र मात्र है, किन्तु आत्मा न कभी जन्म लेती है और न कभी मरती है। निष्काम कर्म ही चित्तशुद्धि का मार्ग है। ३. मनोवैज्ञानिक विश्लेषण एवं आंतरिक रूपांतरण: मृत्यु और हानि के भय को समाप्त करने के लिए अपने भीतर की अचल, साक्षी चेतना में प्रतिष्ठित होना सीखें। आधुनिक मनोविज्ञान के अनुसार मानव की ९०% चिंताएं भविष्य के अनिश्चित परिणामों के डर से उत्पन्न होती हैं। यह श्लोक मनुष्य को मानसिक बिखराव (Cognitive Overload) से निकालकर वर्तमान क्षण की अखण्ड एकाग्रता (Flow State) में स्थापित करता है। ४. सर्वसम्मत समन्वय: चाहे अद्वैत का ज्ञान-मार्ग हो, विशिष्टाद्वैत का शरणागति-मार्ग हो, या द्वैत का भक्ति-मार्ग — सभी आचार्य एक स्वर में स्वीकार करते हैं कि यह श्लोक साधक को अज्ञान के अन्धकार से निकालकर अमरत्व के प्रकाश की ओर ले जाने वाला दिव्य मन्त्र है।
अध्याय 2, श्लोक 42 का दैनिक जीवन सूत्र: अपने चित्त को समता में स्थापित करें और फल की चिंता छोड़कर वर्तमान कर्तव्य को १००% उत्कृष्टता से पूर्ण करें।