Dharma.OS
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आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठंसमुद्रमापःप्रविशन्तियद्वत्।तद्वत्कामायंप्रविशन्तिसर्वेसशान्तिमाप्नोतिनकामकामी।।2.70।।
āpūryamāṇam achala-pratiṣhṭhaṁ samudram āpaḥ praviśhanti yadvat tadvat kāmā yaṁ praviśhanti sarve sa śhāntim āpnoti na kāma-kāmī
संस्कृत शब्दों को तोड़कर सरल उच्चारण सीखें, धीमी गति में सुनें और अपना उच्चारण परखें
।।2.70।। जैसे सम्पूर्ण नदियोंका जल चारों ओरसे जलद्वारा परिपूर्ण समुद्रमें आकर मिलता है, पर समुद्र अपनी मर्यादामें अचल प्रतिष्ठित रहता है ऐसे ही सम्पूर्ण भोग-पदार्थ जिस संयमी मनुष्य को विकार उत्पन्न किये बिना ही उसको प्राप्त होते हैं, वही मनुष्य परमशान्तिको प्राप्त होता है, भोगोंकी कामनावाला नहीं।
Just as waters enter into the ocean which is being filled continuously yet firmly established, so too he into whom all objects of desire enter—he attains peace; not he who longs for the objects of desire.
सम्पूर्ण दर्शनों का एकीकृत निचोड़
१. प्रसंग एवं ऐतिहासिक पृष्ठभूमि (सांख्ययोग - अध्याय 2, श्लोक 70): यह श्लोक कुरुक्षेत्र के युगांतकारी धर्मयुद्ध में श्री कृष्ण द्वारा उच्चारित किया गया है। सांख्ययोग के अन्तर्गत आत्मा की अमरता, षड्भावविकार से परे अविनाशी चैतन्य और स्थितप्रज्ञ के दिव्य लक्षण। २. तत्त्व मीमांसा एवं दार्शनिक विश्लेषण: इस श्लोक में चेतना (Pure Consciousness), कर्म (Action), और समत्व (Equanimity) का गहरा समन्वय है। देह परिवर्तनशील वस्त्र मात्र है, किन्तु आत्मा न कभी जन्म लेती है और न कभी मरती है। निष्काम कर्म ही चित्तशुद्धि का मार्ग है। ३. मनोवैज्ञानिक विश्लेषण एवं आंतरिक रूपांतरण: मृत्यु और हानि के भय को समाप्त करने के लिए अपने भीतर की अचल, साक्षी चेतना में प्रतिष्ठित होना सीखें। आधुनिक मनोविज्ञान के अनुसार मानव की ९०% चिंताएं भविष्य के अनिश्चित परिणामों के डर से उत्पन्न होती हैं। यह श्लोक मनुष्य को मानसिक बिखराव (Cognitive Overload) से निकालकर वर्तमान क्षण की अखण्ड एकाग्रता (Flow State) में स्थापित करता है। ४. सर्वसम्मत समन्वय: चाहे अद्वैत का ज्ञान-मार्ग हो, विशिष्टाद्वैत का शरणागति-मार्ग हो, या द्वैत का भक्ति-मार्ग — सभी आचार्य एक स्वर में स्वीकार करते हैं कि यह श्लोक साधक को अज्ञान के अन्धकार से निकालकर अमरत्व के प्रकाश की ओर ले जाने वाला दिव्य मन्त्र है।
अध्याय 2, श्लोक 70 का दैनिक जीवन सूत्र: अपने चित्त को समता में स्थापित करें और फल की चिंता छोड़कर वर्तमान कर्तव्य को १००% उत्कृष्टता से पूर्ण करें।