Dharma.OS
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नादत्तेकस्यचित्पापंनचैवसुकृतंविभुः।अज्ञानेनावृतंज्ञानंतेनमुह्यन्तिजन्तवः।।5.15।।
nādatte kasyachit pāpaṁ na chaiva sukṛitaṁ vibhuḥ ajñānenāvṛitaṁ jñānaṁ tena muhyanti jantavaḥ
संस्कृत शब्दों को तोड़कर सरल उच्चारण सीखें, धीमी गति में सुनें और अपना उच्चारण परखें
।।5.15।। विभु परमात्मा न किसी के पापकर्म को और न पुण्यकर्म को ही ग्रहण करता है; (किन्तु) अज्ञान से ज्ञान ढका हुआ है, इससे सब जीव मोहित होते हैं।।
The Omnimanifest Soul takes neither sin nor merit born of any action upon itself. But, perfect knowledge is clouded by Illusion, and thus the creatures are deluded.
सम्पूर्ण दर्शनों का एकीकृत निचोड़
१. प्रसंग एवं ऐतिहासिक पृष्ठभूमि (कर्मसंन्यासयोग - अध्याय 5, श्लोक 15): यह श्लोक कुरुक्षेत्र के युगांतकारी धर्मयुद्ध में श्री कृष्ण द्वारा उच्चारित किया गया है। कर्मसंन्यासयोग के अन्तर्गत सन्यास और कर्मयोग के तात्विक एकत्व का उद्घाटन। २. तत्त्व मीमांसा एवं दार्शनिक विश्लेषण: इस श्लोक में चेतना (Pure Consciousness), कर्म (Action), और समत्व (Equanimity) का गहरा समन्वय है। बाह्य कर्मत्याग सन्यास नहीं है, अपितु कर्तापन के अहंकार और फल-आसक्ति का त्याग ही वास्तविक सन्यास है। ३. मनोवैज्ञानिक विश्लेषण एवं आंतरिक रूपांतरण: मन को कमल के पत्ते की भाँति संसार के जल में रहते हुए भी सांसारिक दोषों से सर्वथा निर्लेप रखें। आधुनिक मनोविज्ञान के अनुसार मानव की ९०% चिंताएं भविष्य के अनिश्चित परिणामों के डर से उत्पन्न होती हैं। यह श्लोक मनुष्य को मानसिक बिखराव (Cognitive Overload) से निकालकर वर्तमान क्षण की अखण्ड एकाग्रता (Flow State) में स्थापित करता है। ४. सर्वसम्मत समन्वय: चाहे अद्वैत का ज्ञान-मार्ग हो, विशिष्टाद्वैत का शरणागति-मार्ग हो, या द्वैत का भक्ति-मार्ग — सभी आचार्य एक स्वर में स्वीकार करते हैं कि यह श्लोक साधक को अज्ञान के अन्धकार से निकालकर अमरत्व के प्रकाश की ओर ले जाने वाला दिव्य मन्त्र है।
अध्याय 5, श्लोक 15 का दैनिक जीवन सूत्र: अपने चित्त को समता में स्थापित करें और फल की चिंता छोड़कर वर्तमान कर्तव्य को १००% उत्कृष्टता से पूर्ण करें।