Dharma.OS
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बाह्यस्पर्शेष्वसक्तात्माविन्दत्यात्मनियत्सुखम्।सब्रह्मयोगयुक्तात्मासुखमक्षयमश्नुते।।5.21।।
bāhya-sparśheṣhvasaktātmā vindatyātmani yat sukham sa brahma-yoga-yuktātmā sukham akṣhayam aśhnute
संस्कृत शब्दों को तोड़कर सरल उच्चारण सीखें, धीमी गति में सुनें और अपना उच्चारण परखें
।।5.21।। बाह्य विषयों में आसक्तिरहित अन्त:करण वाला पुरुष आत्मा में ही सुख प्राप्त करता है; ब्रह्म के ध्यान में समाहित चित्त वाला पुरुष अक्षय सुख प्राप्त करता है।।
The enjoyments that arise from contact [with objects] are nothing but sources of misery, having both a beginning and an end. Therefore, an intelligent person does not take delight in them, O son of Kunti!
सम्पूर्ण दर्शनों का एकीकृत निचोड़
१. प्रसंग एवं ऐतिहासिक पृष्ठभूमि (कर्मसंन्यासयोग - अध्याय 5, श्लोक 21): यह श्लोक कुरुक्षेत्र के युगांतकारी धर्मयुद्ध में श्री कृष्ण द्वारा उच्चारित किया गया है। कर्मसंन्यासयोग के अन्तर्गत सन्यास और कर्मयोग के तात्विक एकत्व का उद्घाटन। २. तत्त्व मीमांसा एवं दार्शनिक विश्लेषण: इस श्लोक में चेतना (Pure Consciousness), कर्म (Action), और समत्व (Equanimity) का गहरा समन्वय है। बाह्य कर्मत्याग सन्यास नहीं है, अपितु कर्तापन के अहंकार और फल-आसक्ति का त्याग ही वास्तविक सन्यास है। ३. मनोवैज्ञानिक विश्लेषण एवं आंतरिक रूपांतरण: मन को कमल के पत्ते की भाँति संसार के जल में रहते हुए भी सांसारिक दोषों से सर्वथा निर्लेप रखें। आधुनिक मनोविज्ञान के अनुसार मानव की ९०% चिंताएं भविष्य के अनिश्चित परिणामों के डर से उत्पन्न होती हैं। यह श्लोक मनुष्य को मानसिक बिखराव (Cognitive Overload) से निकालकर वर्तमान क्षण की अखण्ड एकाग्रता (Flow State) में स्थापित करता है। ४. सर्वसम्मत समन्वय: चाहे अद्वैत का ज्ञान-मार्ग हो, विशिष्टाद्वैत का शरणागति-मार्ग हो, या द्वैत का भक्ति-मार्ग — सभी आचार्य एक स्वर में स्वीकार करते हैं कि यह श्लोक साधक को अज्ञान के अन्धकार से निकालकर अमरत्व के प्रकाश की ओर ले जाने वाला दिव्य मन्त्र है।
अध्याय 5, श्लोक 21 का दैनिक जीवन सूत्र: अपने चित्त को समता में स्थापित करें और फल की चिंता छोड़कर वर्तमान कर्तव्य को १००% उत्कृष्टता से पूर्ण करें।