Dharma.OS
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ज्ञानविज्ञानतृप्तात्माकूटस्थोविजितेन्द्रियः।युक्तइत्युच्यतेयोगीसमलोष्टाश्मकाञ्चनः।।6.8।।
jñāna-vijñāna-tṛiptātmā kūṭa-stho vijitendriyaḥ yukta ityuchyate yogī sama-loṣhṭāśhma-kāñchanaḥ
संस्कृत शब्दों को तोड़कर सरल उच्चारण सीखें, धीमी गति में सुनें और अपना उच्चारण परखें
।।6.8।। जिसका अन्तःकरण ज्ञान-विज्ञानसे तृप्त है, जो कूटकी तरह निर्विकार है, जितेन्द्रिय है और मिट्टीके ढेले, पत्थर तथा स्वर्णमें समबुद्धिवाला है -- ऐसा योगी युक्त (योगारूढ़) कहा जाता है।
The yogin whose mind is content with knowledge of the self and also with knowledge of the difference between the self and Prakrti, who is established in the self, whose senses are subdued, and to whom earth, stone, and gold all seem alike, is called integrated.
सम्पूर्ण दर्शनों का एकीकृत निचोड़
१. प्रसंग एवं ऐतिहासिक पृष्ठभूमि (ध्यानयोग - अध्याय 6, श्लोक 8): यह श्लोक कुरुक्षेत्र के युगांतकारी धर्मयुद्ध में श्री कृष्ण द्वारा उच्चारित किया गया है। ध्यानयोग (आत्मसंयम योग) के अन्तर्गत चित्त-वृत्ति निरोध, अभ्यास, वैराग्य और योगाभ्यास की विधि। २. तत्त्व मीमांसा एवं दार्शनिक विश्लेषण: इस श्लोक में चेतना (Pure Consciousness), कर्म (Action), और समत्व (Equanimity) का गहरा समन्वय है। मन ही मनुष्य का सबसे बड़ा मित्र है और यदि अनियंत्रित हो तो मन ही सबसे भयंकर शत्रु बन जाता है। ३. मनोवैज्ञानिक विश्लेषण एवं आंतरिक रूपांतरण: अति-चंचलता को शांत करने के लिए प्रतिदिन मौन, प्राणायाम और नियमित अभ्यास द्वारा मन को अपने वश में करें। आधुनिक मनोविज्ञान के अनुसार मानव की ९०% चिंताएं भविष्य के अनिश्चित परिणामों के डर से उत्पन्न होती हैं। यह श्लोक मनुष्य को मानसिक बिखराव (Cognitive Overload) से निकालकर वर्तमान क्षण की अखण्ड एकाग्रता (Flow State) में स्थापित करता है। ४. सर्वसम्मत समन्वय: चाहे अद्वैत का ज्ञान-मार्ग हो, विशिष्टाद्वैत का शरणागति-मार्ग हो, या द्वैत का भक्ति-मार्ग — सभी आचार्य एक स्वर में स्वीकार करते हैं कि यह श्लोक साधक को अज्ञान के अन्धकार से निकालकर अमरत्व के प्रकाश की ओर ले जाने वाला दिव्य मन्त्र है।
अध्याय 6, श्लोक 8 का दैनिक जीवन सूत्र: अपने चित्त को समता में स्थापित करें और फल की चिंता छोड़कर वर्तमान कर्तव्य को १००% उत्कृष्टता से पूर्ण करें।