Dharma.OS
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श्रीभगवानुवाचमय्यासक्तमनाःपार्थयोगंयुञ्जन्मदाश्रयः।असंशयंसमग्रंमांयथाज्ञास्यसितच्छृणु।।7.1।।
śhrī bhagavān uvācha mayyāsakta-manāḥ pārtha yogaṁ yuñjan mad-āśhrayaḥ asanśhayaṁ samagraṁ māṁ yathā jñāsyasi tach chhṛiṇu
संस्कृत शब्दों को तोड़कर सरल उच्चारण सीखें, धीमी गति में सुनें और अपना उच्चारण परखें
।।7.1।। हे पार्थ ! मुझमें असक्त हुए मन वाले तथा मदाश्रित होकर योग का अभ्यास करते हुए जिस प्रकार तुम मुझे समग्ररूप से, बिना किसी संशय के, जानोगे वह सुनो।।
The Bhagavat said, "O son of Prtha, hear from Me how, with your mind attached to Me, practicing yoga, and taking refuge in Me, you shall understand Me fully, without any doubt."
सम्पूर्ण दर्शनों का एकीकृत निचोड़
१. प्रसंग एवं ऐतिहासिक पृष्ठभूमि (ज्ञानविज्ञानयोग - अध्याय 7, श्लोक 1): यह श्लोक कुरुक्षेत्र के युगांतकारी धर्मयुद्ध में श्री कृष्ण द्वारा उच्चारित किया गया है। ज्ञानविज्ञानयोग के अन्तर्गत परा और अपरा प्रकृति का रहस्य एवं परमात्मा की सर्वव्यापकता। २. तत्त्व मीमांसा एवं दार्शनिक विश्लेषण: इस श्लोक में चेतना (Pure Consciousness), कर्म (Action), और समत्व (Equanimity) का गहरा समन्वय है। भगवान ही समस्त सृष्टि के उद्भव और प्रलय के मूल कारण हैं। जल में रस, सूर्य-चन्द्रमा में प्रकाश और वेदों में ओंकार वही हैं। ३. मनोवैज्ञानिक विश्लेषण एवं आंतरिक रूपांतरण: संसार की दृश्य विविधता के पीछे छिपी एकरस दिव्यता को देखने से मन की ईर्ष्या और संकीर्णता मिट जाती है। आधुनिक मनोविज्ञान के अनुसार मानव की ९०% चिंताएं भविष्य के अनिश्चित परिणामों के डर से उत्पन्न होती हैं। यह श्लोक मनुष्य को मानसिक बिखराव (Cognitive Overload) से निकालकर वर्तमान क्षण की अखण्ड एकाग्रता (Flow State) में स्थापित करता है। ४. सर्वसम्मत समन्वय: चाहे अद्वैत का ज्ञान-मार्ग हो, विशिष्टाद्वैत का शरणागति-मार्ग हो, या द्वैत का भक्ति-मार्ग — सभी आचार्य एक स्वर में स्वीकार करते हैं कि यह श्लोक साधक को अज्ञान के अन्धकार से निकालकर अमरत्व के प्रकाश की ओर ले जाने वाला दिव्य मन्त्र है।
अध्याय 7, श्लोक 1 का दैनिक जीवन सूत्र: अपने चित्त को समता में स्थापित करें और फल की चिंता छोड़कर वर्तमान कर्तव्य को १००% उत्कृष्टता से पूर्ण करें।