Dharma.OS
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अनन्याश्चिन्तयन्तोमांयेजनाःपर्युपासते।तेषांनित्याभियुक्तानांयोगक्षेमंवहाम्यहम्।।9.22।।
ananyāśh chintayanto māṁ ye janāḥ paryupāsate teṣhāṁ nityābhiyuktānāṁ yoga-kṣhemaṁ vahāmyaham
संस्कृत शब्दों को तोड़कर सरल उच्चारण सीखें, धीमी गति में सुनें और अपना उच्चारण परखें
।।9.22।। जो अनन्य भक्त मेरा चिन्तन करते हुए मेरी उपासना करते हैं, मेरेमें निरन्तर लगे हुए उन भक्तोंका योगक्षेम (अप्राप्तकी प्राप्ति और प्राप्तकी रक्षा) मैं वहन करता हूँ।
Those men who, having nothing else as their goal, worship Me everywhere and are constantly thinking of Me alone; to them, who are fully and constantly attached to Me, I bear acquisition and the security of acquisition.
सम्पूर्ण दर्शनों का एकीकृत निचोड़
१. **प्रसंग एवं ईश्वरीय अभयदान**: श्रीमद्भगवद्गीता के अध्याय ९ (राजविद्याराजगुह्ययोग) में भगवान श्री कृष्ण अपने अनन्य साधकों को ब्रह्माण्ड की सबसे बड़ी सुरक्षा गारंटी प्रदान करते हैं। २. **'योग' और 'क्षेम' का गूढ़ अर्थ**: 'योग' का अर्थ है जिस दिव्य गुण, ज्ञान, शांति या भौतिक साधन का अभी साधक के पास अभाव है, उसे परमात्मा स्वयं सुलभ कराते हैं। 'क्षेम' का अर्थ है जो सत्-सम्पत्ति साधक के पास पहले से है, उसकी विपत्ति और काल से रक्षा करते हैं। ३. **आदि शंकराचार्य एवं रामानुजाचार्य भाष्य**: शंकराचार्य कहते हैं कि ज्ञानी भक्त को अपने भरण-पोषण की चिंता करने की आवश्यकता नहीं रहती क्योंकि सम्पूर्ण प्रकृति उसकी सेवा में तत्पर हो जाती है। रामानुजाचार्य के अनुसार भगवान भक्त के प्रेम से इतने वशीभूत हो जाते हैं कि उसका सारा भार अपने कन्धों पर उठा लेते हैं। ४. **मनोवैज्ञानिक विश्लेषण एवं अभाव-भाव से मुक्ति**: मनुष्य की अधिकांश बेचैनी भविष्य की असुरक्षा के कारण होती है। यह श्लोक अगाध श्रद्धा और आत्म-समर्पण द्वारा मन को गहरी शांति में प्रतिष्ठित करता है।
अध्याय 9, श्लोक 22 का दैनिक जीवन सूत्र: अपने चित्त को समता में स्थापित करें और फल की चिंता छोड़कर वर्तमान कर्तव्य को १००% उत्कृष्टता से पूर्ण करें।