Dharma.OS
Dharma.OS
अहंहिसर्वयज्ञानांभोक्ताचप्रभुरेवच।नतुमामभिजानन्तितत्त्वेनातश्च्यवन्तिते।।9.24।।
ahaṁ hi sarva-yajñānāṁ bhoktā cha prabhureva cha na tu mām abhijānanti tattvenātaśh chyavanti te
संस्कृत शब्दों को तोड़कर सरल उच्चारण सीखें, धीमी गति में सुनें और अपना उच्चारण परखें
।।9.24।। क्योंकि सब यज्ञों का भोक्ता और स्वामी मैं ही हूँ, परन्तु वे मुझे तत्त्वत: नहीं जानते हैं, इसलिए वे गिरते हैं, अर्थात् संसार को प्राप्त होते हैं।।
For I alone am the enjoyer and Lord of all sacrifices; but they do not know Me in reality, and thus they return to this mortal world.
सम्पूर्ण दर्शनों का एकीकृत निचोड़
१. प्रसंग एवं ऐतिहासिक पृष्ठभूमि (राजविद्याराजगुह्ययोग - अध्याय 9, श्लोक 24): यह श्लोक कुरुक्षेत्र के युगांतकारी धर्मयुद्ध में श्री कृष्ण द्वारा उच्चारित किया गया है। राजविद्याराजगुह्ययोग के अन्तर्गत संपूर्ण विद्याओं का राजा, अनन्य भक्ति और योग-क्षेम का महा-वचन। २. तत्त्व मीमांसा एवं दार्शनिक विश्लेषण: इस श्लोक में चेतना (Pure Consciousness), कर्म (Action), और समत्व (Equanimity) का गहरा समन्वय है। जो अनन्य भाव से ईश्वर का ध्यान करते हैं, उनके अप्राप्त की प्राप्ति और प्राप्त की रक्षा का भार स्वयं परमात्मा वहन करते हैं। ३. मनोवैज्ञानिक विश्लेषण एवं आंतरिक रूपांतरण: भविष्य की असुरक्षा और भय को विसर्जित करके कर्तव्य में पूर्ण समर्पण करने से अगाध शांति मिलती है। आधुनिक मनोविज्ञान के अनुसार मानव की ९०% चिंताएं भविष्य के अनिश्चित परिणामों के डर से उत्पन्न होती हैं। यह श्लोक मनुष्य को मानसिक बिखराव (Cognitive Overload) से निकालकर वर्तमान क्षण की अखण्ड एकाग्रता (Flow State) में स्थापित करता है। ४. सर्वसम्मत समन्वय: चाहे अद्वैत का ज्ञान-मार्ग हो, विशिष्टाद्वैत का शरणागति-मार्ग हो, या द्वैत का भक्ति-मार्ग — सभी आचार्य एक स्वर में स्वीकार करते हैं कि यह श्लोक साधक को अज्ञान के अन्धकार से निकालकर अमरत्व के प्रकाश की ओर ले जाने वाला दिव्य मन्त्र है।
अध्याय 9, श्लोक 24 का दैनिक जीवन सूत्र: अपने चित्त को समता में स्थापित करें और फल की चिंता छोड़कर वर्तमान कर्तव्य को १००% उत्कृष्टता से पूर्ण करें।